आदिवासियों की संस्कृति बनी प्रेरणा, नन्हें हाथों ने थामी पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता की जिम्मेदारी

REPORTER
सूरजपुर – विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर शासकीय प्राथमिक शाला चट्टीडांड़ में आयोजित गतिविधि दिवस आदिवासी संस्कृति, प्रकृति प्रेम, रचनात्मकता और सामाजिक जिम्मेदारी का अनूठा संगम बन गया।
बच्चों ने आदिवासी वेशभूषा धारण कर जनजातीय जीवनशैली को जीवंत किया, वहीं अपनी रचनात्मक प्रस्तुतियों के माध्यम से संस्कृति संरक्षण के साथ पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता का संदेश भी दिया।
विद्यालय परिसर में बच्चों की प्रस्तुतियों से ऐसा वातावरण बना, मानो सरगुजा और बस्तर की लोकसंस्कृति ने विद्यालय की चौखट पर दस्तक दे दी हो।
विद्यार्थियों ने विभिन्न प्रकार की पत्तियों से आकर्षक पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण तैयार किए

लोकगीत और लोकनृत्य की प्रस्तुतियों के साथ पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों ने गतिविधि को जीवंत बना दिया। बच्चों की रचनात्मकता का अनूठा उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने बोतल, टिफिन डिब्बे, गिलास, किताब और चम्मच जैसी आसपास उपलब्ध वस्तुओं का उपयोग कर वाद्य यंत्र तैयार किए। इन्हीं से आदिवासी गीतों की धुन पर बच्चों ने आर्केस्ट्रा प्रस्तुति दी। इस गतिविधि ने यह संदेश भी दिया कि सीखने के लिए महंगे संसाधन नहीं, बल्कि कल्पनाशीलता और अवसर की जरूरत होती है।
प्रधान पाठक गौतम शर्मा ने बच्चों को बस्तर के प्रसिद्ध आदिवासी बालक चेंदरू की कहानी सुनाई। जंगल और प्रकृति के बीच पले-बढ़े चेंदरू की बाघ से अनोखी दोस्ती ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई। कहानी के माध्यम से बच्चों को आदिवासी जीवन, जंगल और वन्यजीवों के साथ उनके आत्मीय संबंध तथा बस्तर की सांस्कृतिक पहचान से परिचित कराया गया। विद्यार्थियों ने छत्तीसगढ़ के मानचित्र में सरगुजा और बस्तर की स्थिति पहचानी तथा प्रमुख आदिवासी जनजातियों, उनकी वेशभूषा, आभूषण, पारंपरिक व्यंजन, लोकगीत, लोकनृत्य और वाद्य यंत्रों की जानकारी प्राप्त की। स्थानीय भाषायी विविधता को जानने के लिए बच्चों ने अपने सहपाठियों से उनकी बोली में आम, मछली, पेड़ और मुर्गी जैसे शब्द भी सीखे।

कार्यक्रम का सबसे प्रेरणादायी पक्ष रहा पर्यावरण संरक्षण एवं स्वच्छता अभियान। आदिवासी वेशभूषा में सजे बच्चों ने दस्ताने पहनकर विद्यालय परिसर से कचरा एकत्र किया और स्वच्छता का संदेश दिया। इस दौरान बच्चों ने व्यवहार के माध्यम से यह समझाया कि प्रकृति से प्रेम केवल उसके बारे में जानना नहीं, बल्कि उसकी स्वच्छता और सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाना भी है।
प्रधान पाठक गौतम शर्मा ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस केवल जनजातीय संस्कृति और परंपराओं को जानने का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन और उसके संरक्षण की सीख लेने का भी अवसर है। बच्चों ने संस्कृति को जाना, उसे अपनी रचनात्मकता में उतारा और स्वच्छता के माध्यम से सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ऐसी गतिविधियां बच्चों को किताबों से आगे ले जाकर संस्कृति, प्रकृति, रचनात्मकता और सामूहिक जिम्मेदारी को अनुभव के माध्यम से समझने का अवसर देती हैं। चट्टीडांड़ स्कूल में आयोजित यह गतिविधि दिवस इस संदेश के साथ यादगार बन गया कि संस्कृति की जड़ें प्रकृति में हैं और प्रकृति की सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। बच्चों की प्रस्तुतियों ने आदिवासी संस्कृति के सम्मान के साथ-साथ स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण के प्रति जागरूकता की नई तस्वीर भी प्रस्तुत की।



