
हिंदी साहित्य में ऐसे उपन्यास बहुत कम ही देखने को मिलते हैं जिनमें प्रकृति, इतिहास, लोकसंस्कृति, भूगोल और मानवीय संवेदनाओं का समन्वय इतनी गहराई और सहजता के साथ किया गया हो।
यह आश्चर्यजनक है कि ‘मैकल की अनुगूँज’ उनका प्रथम प्रकाशित उपन्यास है, क्योंकि इसकी भाषा, कथानक की विषय वस्तु और वर्णन शैली किसी अनुभवी उपन्यासकार की परिपक्वता का परिचय देती है। उपन्यास में प्रयुक्त भाषा सरल होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली है। लेखक ने प्रकृति का केवल सौंदर्य चित्रण नहीं किया बल्कि उसे जीवंतता प्रदान की है।
डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी द्वारा रचित यक्षिणी… मैकल की अनुगूँज.. ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, जो केवल कथा नहीं बल्कि मध्यभारत के अरण्य प्रदेशों, पर्वत श्रृंखलाओं, नदियों, मंदिरों और जनजीवन की जीवंत अनुभूति कराता है। यह उपन्यास पाठकों को एक ऐसे संसार में ले जाता है जहाँ प्रकृति स्वयं संवाद करती प्रतीत होती है।
यक्षिणी – मैकल की अनुगूंज.. चार खंडों- बीज, अंकुरण, अनुगूँज और अंतरध्वनि में विभाजित यह कृति अपने शीर्षकों की भाँति क्रमशः विकास, विस्तार और आत्मबोध की यात्रा प्रस्तुत करती है। उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखक ने केवल काल्पनिक घटनाओं का सहारा नहीं लिया, बल्कि स्थानीय भूगोल, जनश्रुतियों, ऐतिहासिक स्थलों और सांस्कृतिक विरासत को अत्यंत प्रामाणिकता के साथ कथानक में पिरोया गया है।
प्रथम खंड -‘बीज’ में स्मृति, घर की देहरी ,वन की दृष्टि ,अमरकंटेश्वर ,प्रथम परीक्षा,परिचय ,नर्मदा, प्रत्यंचा की ध्वनि, रतनपुर का निमंत्रण, बाल सखा, आचार्य का निर्णय, प्रस्थान की पूर्व संध्या ,गुरुकुल से प्रस्थान ‘वन अपने पाठ स्वयं पढ़ाता है’ जैसे शीर्षक केवल अध्याय नहीं बल्कि लेखक की प्रकृति-दृष्टि को प्रकट करते हैं। धनुर्विद्या, मौन संवाद और गुरुकुल की मर्यादाएँ पाठक को प्राचीन भारतीय जीवनशैली की ओर ले जाती हैं।
द्वितीय खंड – ‘अंकुरण’ में रतनपुर,महामाया मंदिर, और चांगभखार जैसे स्थलों के माध्यम से इतिहास और लोकजीवन का विस्तार सामने आता है। यहाँ लेखक ने केवल स्थानों का वर्णन नहीं किया बल्कि उन स्थलों की आत्मा को शब्द दिए हैं। मैकल का वन समुद्र’ और ‘मार्गों का संगम’ जैसे शीर्षक पाठक के मन में दृश्य रच देते हैं।
तृतीय खंड – ‘अनुगूँज’ उपन्यास को और अधिक गहराई प्रदान करता है। उत्तर के अरण्य पथ, मातिन दाई, घुटरीदाई तथा कोरिया गढ़ के वर्णन में लोकविश्वास और ऐतिहासिक चेतना का सुंदर समावेश दिखाई देता है। ‘चरैवेति… चरैवेति…’ जीवन के निरंतर प्रवाह और मानव के अनवरत संघर्ष का प्रतीक बनकर उभरता है। लेखक ने वन संस्कृति की भाषा और उसके मौन संदेशों को अत्यंत संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है।
चतुर्थ खंड- ‘अंतरध्वनि’ उपन्यास का भावनात्मक और दार्शनिक उत्कर्ष कहा जा सकता है। बैकुंठपुर, अगस्त्य आश्रम, रामगढ़, गौर घाट, बालम पहाड़ और जनकपुर क्षेत्र का गांगी रानी देवी मंदिर जैसे स्थलों का चित्रण पाठकों को इतिहास और अध्यात्म के समागम का अनुभव कराता है। यहाँ कथा केवल बाहरी यात्रा नहीं रहती बल्कि आत्मचिंतन की दिशा में अग्रसर हो जाती है। ‘आज का दृश्य’ जैसे अध्याय वर्तमान और अतीत के बीच सेतु का कार्य करते हैं। डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी होने के साथ-साथ संवेदनशील साहित्यकार भी हैं। डीएसपी, डिप्टी कलेक्टर, एसडीएम तथा नगर निगम कमिश्नर जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य करते हुए उन्होंने समाज और जनजीवन को निकट से देखा है। वर्तमान में कोरिया जिले में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में कार्यरत रहते हुए भी साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रशंसनीय है। यही कारण है कि उनके लेखन में प्रशासनिक अनुभव की गंभीरता और साहित्यिक संवेदना की कोमलता दोनों साथ दिखाई देती हैं। यह आश्चर्यजनक है कि ‘मैकल की अनुगूँज’ उनका प्रथम प्रकाशित उपन्यास है, क्योंकि इसकी भाषा, कथानक की विषय वस्तु और वर्णन शैली किसी अनुभवी उपन्यासकार की परिपक्वता का परिचय देती है। उपन्यास में प्रयुक्त भाषा सरल होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली है। लेखक ने प्रकृति का केवल सौंदर्य चित्रण नहीं किया बल्कि उसे जीवंतता प्रदान की है।
वर्तमान समय में साहित्य का एक बड़ा वर्ग कृत्रिमता और तात्कालिक विषयों तक सीमित होता जा रहा है, ऐसे समय में ‘यक्षिणी… मैकल की अनुगूँज’ जैसी कृति भारतीय अरण्य संस्कृति, लोक चेतना और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को पुनर्जीवित करने का कार्य करती नजर आ रही है। यह उपन्यास केवल पढ़ने की वस्तु नहीं बल्कि अनुभव करने योग्य साहित्यिक यात्रा है। निस्संदेह, यह कृति हिंदी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में सफल होगी और पाठकों को प्रकृति, इतिहास तथा संस्कृति के प्रति नए दृष्टिकोण से सोचने के लिए प्रेरित करेगी।

