नहर विवाद पर विभाग का बचाव, जमीनी हकीकत पर उठे नए सवाल
भांडी-जनकपुर में ‘जल-तांडव’ पर विभाग की सफाई, ग्रामीण बोले—“तकनीकी नहीं, वास्तविक समस्या है”

बैकुंठपुर- कोरिया/ जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर के भांडी-जनकपुर क्षेत्र में नहरों से बहते पानी और उससे हो रही तबाही को लेकर प्रकाशित खबर के बाद जल संसाधन विभाग ने अपना पक्ष सामने रखा है। विभाग ने इसे “तकनीकी प्रक्रिया” बताते हुए पानी के बहाव को आवश्यक डिस्चार्ज करार दिया है। हालांकि, विभाग के इस बचाव के बाद भी जमीनी हालात और ग्रामीणों के आरोपों ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।

विभाग का दावाः वेस्टेज नहीं, तकनीकी जरूरत
जल संसाधन विभाग के अनुसार एलबीसी मुख्य नहर का गेट खराब होने और चल रहे जीर्णोद्धार कार्य के कारण पानी को नियंत्रित करना फिलहाल संभव नहीं है। तब प्रश्न उठता है कि एलबीसी मुख्य नहर का मेंटेनेंस क्यों नहीं किया गया । नहर का गेट खराब है सिर्फ यही बोल देने मात्र से समाधान नहीं निकाला जा सकता इस ओर संबंधित अधिकारियों ने पूर्व में कोई स्पष्टीकरण क्यों नहीं जारी किया।
विभाग ने स्पष्ट किया है कि एलबीसी मुख्य नहर का मेन गेट खराब होने के कारण पानी को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है। साथ ही जनवरी 2026 से आरडी 6,945 मीटर से 14,700 मीटर तक जीर्णोद्धार कार्य जारी है, जिसके चलते क्यूरिंग, सिल्ट नियंत्रण और फ्लशिंग जैसी प्रक्रियाओं के लिए अस्थायी एस्केप बनाया गया है। विभाग का दावा है कि कार्य पूर्ण होने के बाद इस अस्थायी व्यवस्था को बंद कर दिया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत इससे कुछ अलग तस्वीर भी दिखा रही है। जिन क्षेत्रों में पानी की आवश्यकता अधिक है, वहां किसानों को केवल 60 प्रतिशत ही जल आपूर्ति मिल रही है। शेष 40 प्रतिशत आपूर्ति कार्य पूर्ण होने के बाद देने की बात कही जा रही है, जिससे रबी फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। कई किसानों का कहना है कि एक ओर नहर में पानी बह रहा है, तो दूसरी ओर जहां जरूरत हैं वहां खेत सूखे पड़े हैं यह स्थिति समझ से परे है।
विभाग द्वारा यह भी बताया गया कि 496.99 लाख रुपये की लागत से चल रहे इस कार्य में अब तक 88 लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं और जिला प्रशासन की निगरानी में कार्य जारी है। बावजूद इसके, कार्य की गति और गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
जनता के हित में यह जरूरी है कि विभाग केवल तकनीकी तर्क देने तक सीमित न रहे, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि उपलब्ध जल का समुचित और न्यायसंगत वितरण हो। साथ ही पारदर्शिता बनाए रखते हुए नियमित रूप से प्रगति की जानकारी सार्वजनिक की जाए, ताकि लोगों के मन में उठ रहे संदेह दूर हो सकें।

जमीनी हकीकतः घरों के पीछे बह रहा ‘नाला’
दूसरी ओर भांडी और जनकपुर क्षेत्र के ग्रामीणों की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
ग्रामीणों का कहना है किः
नहरों की जर्जर हालत के कारण पानी नहरों से फूटकर बाहर गिर रहा है
घरों के पीछे स्थायी रूप से नाले जैसी स्थिति बन गई है जिससे पानी की बर्बादी हो रही है ग्रामीणों का साफ कहना है कि यह “तकनीकी प्रक्रिया” नहीं, बल्कि लापरवाही और कुप्रबंधन का परिणाम है।
सबसे बड़ी विडंबना यह सामने आ रही है किः नहर के ऊपरी हिस्सों में पानी बर्बाद हो रहा है लोगों के घरों को नुकसान पहुंचा रहा है। भीषण गर्मी में जब जल संरक्षण जरूरी है उस समय जल की बर्बादी को जरूरी करार देना केवल भ्रष्ट कार्यो को संरक्षण की दिशा देना दिख रहा है जबकि अभी भारी गर्मी का समय शेष है साथ ही कोई वर्षाकाल नहीं
वहीं टेल-एंड के किसान अब भी पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं
विभाग खुद स्वीकार कर चुका है कि केवल 60 प्रतिशत जल आपूर्ति ही हो पा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब पानी उपलब्ध है, तो उसका समुचित वितरण क्यों नहीं हो पा रहा?

मेंटेनेंस पर उठे सवाल, जांच की मांग तेज
हर साल नहरों की सफाई और मरम्मत के नाम पर खर्च होने वाले बजट पर भी अब सवाल खड़े हो गए हैं।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का कहना है किः
कागजों में मरम्मत दिखाई जाती है
जमीन पर नहरें जर्जर ही रहती हैं
इस पूरे मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है।
बढ़ सकता है जनआंदोलन
स्थिति को लेकर क्षेत्र में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ, तो जल संसाधन विभाग के खिलाफ आंदोलन और घेराव किया जाएगा।



