
जिंदगी का फलसफा नहीं
मैं एक अनकही बात हूं।
मेरा कोई वर्ण नहीं
एक बेशर्म जात हूं।
मैं तो श्रमिक वरांगना(वेश्या) हूं
सभ्य समाज की शर्मिंदा रात हूं
केवड़ा मोंगरा ना मैं जूही
मैं हुस्ना रात की रानी हूं ।
महल अटारी मैं क्या जानू
मैं बदनाम गली की गाली हूं।
अंधकार की शबनम हूं मैं
मिटती हूं न मरती हूं ।
भूल के अपने तन की पीड़ा
रात की रानी बनती हूं।
उजला” राजा” छुपकर आता
दिनकर भी शाम लूटाता है ।
तंग गली मे संग दिल वादे
भोर हुए मिट जाता है।
नगरवधू और गणिकाएं तो
रंग महल में सजती है।
पर कोठे में रहने वाली
क्या महलों को छू सकती है?
रोशनी में जीने की चाहत
एक दिन कोठे में मर जाएगी
पर अंधकार में जन्मा जीवन
क्या जीने का हक पाएगी?
बदन में अपना “बोझ”उठाकर
“श्रम”की कीमत लेती हूं ।
सूरज चंदा मैं ना मांगू
बस अंधकार से डरती हूं।
अंधकार से डरती हूं….!!
संध्या रामावत
समाजसेवी साहित्यकार
बैकुंठपुर कोरिया छत्तीसगढ़



