छत्तीसगढ़

डंगनिया तालाब और भूजल संरक्षण की चुनौती

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-राजेंद्र कुमार निगम

राजधानी रायपुर का डंगनिया तालाब इस समय लबालब भरा हुआ है, लेकिन इसके बावजूद नगर का ट्यूबवेल लगातार चलाया जा रहा है। यह ट्यूबवेल पीने योग्य भूमिगत स्वच्छ पानी से तालाब को भर रहा है, जिससे बहुमूल्य भूजल का अपव्यय हो रहा है। यह स्थिति नई नहीं है, बल्कि वर्षों से जारी है। सवाल यह है कि जब तालाब पहले से ही भरा हुआ है, तब भी भूमिगत जल को निकालकर उसमें डालने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।

डंगनिया और डीडी नगर क्षेत्र में भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। कभी यहां का ग्राउंड वाटर स्तर लगभग 70 फीट पर हुआ करता था, लेकिन आज यह 200 फीट से भी अधिक गहराई तक पहुंच चुका है। यह आंकड़ा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हम अपने प्राकृतिक जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर रहे हैं। हाल ही में 12 मार्च के एक समाचार पत्र में भी इस विषय का उल्लेख किया गया, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि अब तक प्रशासन की ओर से इस दिशा में कोई ठोस पहल नजर नहीं आई है।

शहर के कई इलाकों में बोरवेल सूखने लगे हैं। डंगनिया क्षेत्र में अभी भी भूमिगत जल अपेक्षाकृत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन यदि इसी तरह तालाबों को अनावश्यक रूप से ट्यूबवेल के पानी से भरा जाता रहा, तो आने वाले समय में यहां के आवासीय बोरवेल भी शहर के अन्य क्षेत्रों की तरह सूख सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रशासन इस अपव्यय को तुरंत रोकने की दिशा में कदम उठाएं।

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यह भी समझना जरूरी है कि धरती के भीतर जल का भंडारण प्रकृति की एक धीमी और दीर्घकालिक प्रक्रिया है। बूंद-बूंद वर्षा का पानी वर्षों में जमीन के भीतर जमा होकर भूजल बनाता है। यदि हम इसे बिना सोचे-समझे निकालते रहेंगे, तो यह अमूल्य संसाधन तेजी से समाप्त हो जाएगा।

तालाबों में पंप लगाकर पानी भरने की व्यवस्था केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों में भी यह व्यवस्था देखने को मिलती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग तालाबों में स्नान करते हैं और पशुओं को भी वहीं पानी पिलाया जाता है, इसलिए तालाबों में पानी बनाए रखने के लिए पंप लगाए जाते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि इसके लिए लगातार भूजल का उपयोग किया जाए। इसके बजाय वर्षा जल का अधिकतम संचयन किया जाना चाहिए।

जल स्तर गिरने की समस्या केवल किसी एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश और देश की एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। शहरों में तेजी से हो रहे कंक्रीट के निर्माण ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। नियमों के अनुसार किसी भी कॉलोनी या मकान में केवल 45 प्रतिशत क्षेत्र में ही पक्का निर्माण होना चाहिए, जबकि शेष 55 प्रतिशत हिस्सा खुला और कच्चा रहना चाहिए, ताकि वर्षा का पानी जमीन में समा सके। लेकिन व्यवहार में इन नियमों का पालन बहुत कम दिखाई देता है।
इसके अलावा रेन वाटर हार्वेस्टिंग यानी वर्षा जल संचयन की व्यवस्था भी शहरों में लगभग नगण्य है। यदि हर मकान, हर कॉलोनी और हर सार्वजनिक भवन में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से लागू की जाए, तो भूजल स्तर को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

आज आवश्यकता है व्यापक जनजागरूकता की। जल संरक्षण केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह समाज के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि हम आज सचेत नहीं हुए, तो आने वाले समय में जल संकट और भी गंभीर रूप ले सकता है।

प्रकृति ने हमें जल का अनमोल उपहार दिया है। इसे बचाना और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। इसलिए जरूरी है कि डंगनिया तालाब जैसे मामलों में अनावश्यक भूजल दोहन को रोका जाए और जल संरक्षण के नियमों का सख्ती से पालन किया जाए। तभी हम अपने शहर और पर्यावरण को सुरक्षित रख सकेंगे।

 

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