मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर

ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को कहा कोई सुना नही अब खुद बनाने लगे सड़क

मनियारी का आश्रित ग्राम बडेरा के जनजातीय ग्रामीण पक्की सड़क के लिये तरस रहे

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एमसीबी/ मनेंद्रगढ़ चिरमिरी भरतपुर जिला मुख्यालय से लगभग 190 किलोमीटर दूर ब्लॉक मुख्यलय भरतपुर(जनकपुर)से 70,75किलोमीटर बीहड़ वनांचल क्षेत्र बडेरा गांव में जब दैनिक सम्यक क्रांति की टीम पहुची तो वहां के ग्रामीणों के दर्द से रूबरू हुए सरकार लाख दावा करे कि ग्रामीण अंचलों में सड़कों का जाल बिछा दिया गया है इनको मुख्य सड़क से जोड़ दिया गया है लेकिन जमीनी हकीकत यहां आने से दिखती है ग्राम पंचायत मनिहारी के आश्रित ग्राम बडेरा आजादी की 79 वर्ष वीं वर्षगांठ मना लिया लेकिन यहां पक्की सड़क की सुविधा नहीं मिल पाई है। बडेरा गांव तक सड़क की सुविधा नहीं होने से स्थानीय लोग परेशान हैं।

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स्थानीय ग्रामीण हर वर्ष श्रमदान कर सड़क का निर्माण करते हैं, लेकिन बारिश के मौसम में कच्ची सड़क कीचड़ में तब्दील हो जाती है। कच्ची सड़क का यह मामला बडेरा गांव तक जाने वाली सड़क की है। ग्रामीण हर वर्ष श्रमदान कर इस सड़क का निर्माण करते हैं, परंतु बारिश के बाद सड़क कीचड़ में तब्दील हो जाती है।

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बडेरा में पिछले कई वर्षों से सड़क की स्थिति जर्जर बनी हुई थी। सड़क निर्माण कराने की मांग को लेकर सरपंच कार्यालय में स्थानीय लोगों ने कई बार आवेदन दिए, परंतु जर्जर सड़क के सुदृढ़ीकरण की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लाचार होकर बडेरा के ग्रामवासी सड़क पर बने गड्ढों को भरने का बीड़ा उठाया और श्रमदान कर सड़क को चलने लायक बनाया।

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स्थानीय लोगों के अनुसार, कई वर्षों से काम कर रहे हैं जनहित से जुड़े सभी विकास कार्य अवरुद्ध हो गए। आवासीय क्षेत्र में विशेषकर सड़कों की स्थिति जर्जर हो गई। बारिश के बाद इन सड़कों पर पैदल चलना भी मुश्किल है। आए दिन इन जर्जर सड़कों पर दुर्घटनाएं होती रहती हैं।

बडेरा गांव के लगभग 35 घर बैग,पंडों विशेष पिछड़ी जनजाति की बस्ती है। हर एक शख्स ने हाथ में कुदाल और फावड़ा लिया और जुट गया। बडेरा गांव की ओर जाने वाला रास्ता पहाड़ के बीच से बन गया। फिर भी इस पहाड़ी रास्ते को सुधारने की प्रशासन ने कभी जहमत नहीं उठाई। हर साल बारिश में रास्ता खराब हो जाता है।

बारिश के समय पहाड़ी रास्ते की सबसे बड़ी दिक्कत सामने आती थी। पहाड़ से नीचे उतरने वाला पानी रास्ता खराब कर देता था, जिससे ग्रामीणों को आवागमन में परेशानी होती थी। इस 15 किलोमीटर सड़क को बनाने के लिए भी ग्रामीणों ने जिला प्रशासन का दरवाजा खटखटाया।

पहाड़ी रास्ते से बोल्डर हटवाकर रास्ता बन गया। जिससे अब ग्रामीण बारिश में भी बडेरा गांव आसानी से आ जा रहे हैं। ग्रामीणों ने अपनी समस्या का समाधान करने के लिए श्रमदान किया और सड़क को ठीक किया।

रामचंद्र सड़क बनाने वाले ग्रामीण ने बताया कि रोड बना रहे हैं क्योंकि कोई मदद नहीं देते हैं। सरपंच से किसी चीज की उम्मीद नहीं है। उन्होंने कहा कि हॉस्पिटल जाना पड़ता है, कहीं बाजार आना पड़ता है, और ग्रामीणों को कई दिक्कतें होती हैं।

रामचंद्र ने बताया कि कहीं डिलीवरी हो जाती है, और अस्पताल आने-जाने में दिक्कत होती है। इसलिए 15 दिन से ग्रामीण खुद सड़क बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह सेवा है, और ग्रामीण अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए यह काम कर रहे हैं।

हरिश्चंद्र ग्रामीण ने बताया कि इस रोड को कोई नहीं बनवाता है और कोई ध्यान नहीं देता है। इसलिए ग्रामीण खुद सड़क की मरम्मत करते हैं ताकि आने-जाने में सुविधा हो। उन्होंने कहा कि 108 एंबुलेंस नहीं आ पाती है और सरपंच सचिव भी ध्यान नहीं देते हैं।

हरिश्चंद्र ने बताया कि कई लोग यहां एक्सीडेंट हो जाते हैं क्योंकि सड़क पर पत्थर हैं। ग्रामीण 15-20 दिन से सड़क बनाने में लगे हुए हैं और धीरे-धीरे करके इसे बना रहे हैं।

ग्रामीणों को नेटवर्क की समस्या भी है और जंगली जानवरों का खतरा भी है। हरिश्चंद्र ने बताया कि जंगली जानवर अक्सर सड़क पर आ जाते हैं और ग्रामीणों को खतरा होता है। ग्रामीणों को अपनी सुरक्षा के लिए भी चिंतित होना पड़ता है।

लखन ग्रामीण ने बताया कि वह खुद सड़क बना रहा है क्योंकि कोई मदद नहीं मिल रही है। आने-जाने में दिक्कत होती है, और अस्पताल जाने के लिए भी परेशानी होती है।
कोई मदद नहीं कर रहा है, और वह खुद ही सड़क बना रहा है। 10-12 दिन से काम कर रहा है, लेकिन अभी भी काम अधूरा है हर साल यह समस्या होती है।

सरकार लाख दवा करे ही हर क्षेत्र में विकास किया जा रहा है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है इन पिछड़ी जनजाति के दुख दर्द को कोई बाटने वला नहीं है सरकार अति है चली जाती है सिर्फ इनको बोट बैंक माना जा रहा है
अब देखने होगा कि इस खबर प्रकाशन के बाद क्या शासन प्रशासन इनकी सुध लेता है या ये ग्रामीण ऐसे ही अपनी लड़ाई लड़ते रहेंगे।

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