
बैकुंठपुर/ राष्ट्रीय सेवा योजना एवं भारतीय शिक्षण मंडल छत्तीसगढ़ प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में शासकीय रामानुज प्रताप सिंह देव स्नातकोत्तर महाविद्यालय बैकुंठपुर के सभाकक्ष में व्यास गुरु पूजन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। व्यास पूजा कार्यक्रम डॉ एस. एन.पाण्डेय कार्यक्रम समन्वयक संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय सरगुजा अंबिकापुर के मुख्य आतिथ्य, श्री विनय मोहन भट्ट एम आई एस प्रशासक जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय बैकुंठपुर के विशिष्ट आतिथ्य में आयोजित हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के प्राचार्य एवं जिला संगठक डॉ एम. सी. हिमधर ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ महर्षि वेद व्यास एवं मां सरस्वती के छायाचित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर किया गया। स्वयं सेविका पूजा पंकज ने गुरू वंदना प्रस्तुत करते हुए अपने सुंदर गीत के माध्यम से गुरु की महिमा का गायन किया। स्वागत उद्धबोधन देते हुए जिला संगठक ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्ता सर्वोपरि है। हम सबने अपने जीवन में प्रथम गुरु मां बाप से लेकर शिक्षा दीक्षा में अलग अलग स्तर पर अनेक गुरुओं से बौद्धिक, अध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों का ज्ञान प्राप्त किया है।आज जिस मुकाम पर हैं उसका श्रेय गुरूओं के मार्गदर्शन और आशीर्वाद को जाता है। व्यास पूजा के माध्यम से आप सभी अपने गुरूओं के प्रति सम्मान प्रकट कीजिए। कितनी भी टेक्नोलॉजी और एआई आ जाए। भौतिक गुरुओं का स्थान नहीं ले सकता। मानवीय संवेदनाओं , नैतिक मूल्यों और संस्कार की शिक्षा नहीं दे सकता है । विनय मोहन भट्ट जी ने कहा कि गुरु शिष्य की परंपरा बहुत गहरा है,हम आप जो समझ पाते हैं बहुत कम है। इतिहास बताता है कि कई ऐसे गुरु रहें हैं जो सम्राटों के पूजनीय और मार्गदर्शक रहे हैं। पुराने समय में हमारे गांवों में गुरूजी ही जज भी हुआ करते थे। ग्रामीणों के स्थानीय समस्याओं का समाधान भी करते थे। आज परिस्थितियां बदलीं है। मुख्य अतिथि पाण्डेय जी ने कहा कि गुरु शिष्य परंपरा भारतीय मूल्यों में से एक है। गुरु शिष्य परंपरा कल भी पावन था आज भी है और हमेशा रहेगा। हमारा वेद उपनिषद, धार्मिक ग्रंथ गुरु शिष्य परंपरा से भरा पड़ा है। भगवान राम और उनके गुरु वशिष्ठ व विश्वामित्र, कृष्ण और महर्षि सांदीपनि के बीच जो संबंध थे आज वो नहीं है। गुरु हमेशा से प्रेरणा देने वाला,राह दिखाने वाला रहा है। पहले गुरु शिष्य के प्रति और शिष्य गुरु के प्रति समर्पित रहते थे। गुरु द्रोणाचार्य और एकलव्य के बीच संबंध गुरु शिष्य के संबंध का पराकाष्ठा है। युग निर्माण का सणय चल रहा है। अपनी संस्कृति और परंपरा को कैसे बचाया जाए। ब्यास पूजा के माध्यम से गुरु शिष्य के बदलते संबंधों को कैसे सुदृढ़ किया जाए, प्रयास चल रहा है।हम सबको भारतीय संस्कृति और गुरु परंपरा को अपने आचरण में उतारना होगा। अंत में प्राचार्य एवं कार्यक्रम अधिकारी द्वय श्रीमती जयश्री प्रजापति और अनुरंजन कुजूर द्वारा मंचासीन दोनों गुरूओ का साल श्रीफल भेंट कर सम्मान किया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापकगण,स्टाफ ,जिले के विभिन्न कालेजों एवं स्कूलों से आए हुए रासेयो कार्यक्रम अधिकारी, स्वयंसेवक,नोडल शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे । कार्यक्रम का संचालन डॉ कुलदीप ओझा अतिथि व्याख्याता भूगोल ने किया। आभार प्रदर्शन कार्यक्रम के संयोजक प्रो अनुरंजन कुजूर ने किया।



