राष्ट्रपति के ‘दत्तक पुत्रों’ का हक डकार गया वन विभाग? साल भर से मजदूरी को तरसते ग्रामीण, अब वन मंडलाधिकारी के पाले में गेंद।

प्रदीप पाटकर
मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर / छत्तीसगढ़ के वनांचल क्षेत्रों में मजदूरों के पसीने की कीमत कौड़ियों के भाव समझी जा रही है। जिला एमसीबी के अंतर्गत आने वाले वन परिक्षेत्र बहराशी में एक बेहद शर्मनाक मामला सामने आया है, जहाँ 26 गरीब श्रमिकों को एक साल बीत जाने के बाद भी उनकी जायज मजदूरी नहीं मिली है। कलेक्टर को सौंपे गए शिकायती पत्र ने अब वन विभाग के उच्चाधिकारियों की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
वन मंडलाधिकारी (DFO) की चुप्पी पर सवाल: क्या सो रहा है प्रशासन?

हैरानी की बात यह है कि मजदूर महीनों से विभाग के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन वन मंडलाधिकारी (DFO) के नाक के नीचे भ्रष्टाचार या लापरवाही का यह खेल बदस्तूर जारी है। नियमतः, काम पूरा होने के 15 दिनों के भीतर भुगतान हो जाना चाहिए, लेकिन यहाँ साल भर का वक्त बीत गया। क्या वन मंडलाधिकारी को अपने अधीनस्थ बीटगार्ड और डिप्टी रेंजरों की मनमानी की भनक नहीं है? या फिर जानबूझकर इन गरीब आदिवासियों की आवाज़ को दबाया जा रहा है?
’राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों’ के साथ विश्वासघात।
सरकार जिन्हें ‘राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र’ (पण्डो जनजाति) मानकर विशेष संरक्षण देने का दावा करती है, वन विभाग के मैदानी अमले ने उन्हें ही अपना शिकार बना लिया है। ग्राम पोंडी और लालमाटी के 26 श्रमिकों ने रांपा बीट में ‘पत्थर बंधाई चकडेम’ और ‘तार मरम्मत’ का कठिन कार्य किया था। अपनी मेहनत का पैसा माँगने पर उन्हें केवल तारीखें मिल रही हैं।
बीटगार्ड और डिप्टी रेंजर की भूमिका संदिग्ध।
शिकायती पत्र में सीधे तौर पर वन सुरक्षा बीटगार्ड मनधारी सिंह और डिप्टी सुरेश सेंगर का नाम लिया गया है। इन्हीं की देखरेख में काम कराया गया था। ग्रामीणों का आरोप है कि इन अधिकारियों ने काम तो करा लिया, लेकिन जब भुगतान की बारी आई तो पल्ला झाड़ लिया। सवाल यह उठता है कि क्या इन छोटे कर्मचारियों के पास इतनी पावर है कि वे साल भर तक भुगतान रोक सकें, या इसमें ऊपर तक “हिस्सेदारी” का खेल है?
बहराशी वन परिक्षेत्राधिकारी (RO) की कार्यप्रणाली कटघरे में।
मजदूरों ने साफ किया है कि 18 मई 2025 को उन्होंने वन परिक्षेत्राधिकारी (RO) बहराशी को लिखित आवेदन दिया था। इसके बावजूद आज तक कोई निराकरण नहीं होना यह दर्शाता है कि विभाग के भीतर फाइलों को दबाने की परंपरा बन चुकी है। कलेक्टर को सौंपे गए पत्र में साफ लिखा है कि पूर्व की शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं हुई, जिससे मजबूर होकर उन्हें जिला मुख्यालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
मजदूरी का ब्यौरा: पसीने की एक-एक बूंद का हिसाब।
आवेदन में संलग्न सूची के अनुसार, जहाँ सोन साय पण्डो ने 90 दिनों तक कड़ा श्रम किया, वहीं सुखसेन, अर्जुन, शंकर, और अनीता पण्डो जैसे दर्जनों ग्रामीणों ने हफ़्तों काम किया। इन मजदूरों के पास अब घर चलाने के लिए पैसे नहीं हैं, जबकि विभाग के बजट कहाँ खप रहे हैं, इसका कोई अता-पता नहीं है।



