
एस. के.”रूप”
बैकुंठपुर–कोरिया/ आधुनिक समय जहां सारी सुविधाएं है इंसानों के लिए लेकिन एक मूक प्राणी को सुरक्षित किसी स्थान में इलाज करके छोड़ देने या उसकी पीड़ा कम करने या उसकी समुचित व्यवस्था करने का कोई विकल्प ही नही?जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ते लड़ते वह मूक प्राणी प्राण त्याग दिया।

लेकिन जाते जाते सिस्टम के मुंह में तमाचा जड़ गया और कुछ सवाल छोड़ गया:
बंदर को कुत्ते ने काटा, इसके पहले एक गरीब परिवार की बच्ची को चीर फाड़ के आवारा कुत्ते मार डाले,एक गाय को काटा वो पागल होकर शहर भर में आतंक मचा डाली फिर मर गई, इंसान पर भी आए दिन हमले हो रहे है आवारा कुत्तों के आवारगी पर नियंत्रण क्यों नही? इनके लिए कोई उपक्रम क्यों नही?जब बंदर को आवारा कुत्तों में काटा और इसका पता चला तब बंदर को एंटी रेबीज दिया गया अथवा नहीं? रेबीज फैलने के बाद का क्या विकल्प बस यही है कि तड़प तड़प के मरने को छोड़ दिया जाए?या शासकीय कर्मचारी जिनकी यह ड्यूटी है अपने जानमाल को ही डरते है कि कहीं उन्हें न काट ले। हां सुरक्षा जरूरी भी है लेकिन क्या इसके लिए कोई पेड एक्सपर्ट की सलाह या बुलाकर कार्य नही कराया जा सकता है?

वन अमला आया और कुछ नही कर सका जबकि वन अमले के पास तो कई तरीके है और साधन भी। शोक! के रक्षक भी बचा नही सके एक मूक पशु की जान। कोशिश पशु चिकित्साधिकारी के कर्मचारियों ने भी की लेकिन वो पकड़ने दौड़ने और साधनों से परिपूण तो नही होते जैसे वन अमला फिर वो क्या करते। इधर गौ सेवक अनुराग दुबे ने जितना हो सका किया लेकिन वो भी क्या कर पाते मूक प्राणी की मौत में दुखी है। कुल मिलाकर बंदर नही मरा उसने उजागर कर दिया कि छोटी छोटी समस्या का भी समाधान नही है । यह सिस्टम का खोखलापन ही तो है। जो बड़ी बड़ी डींगे हाकना अवश्य जानता है। यह बात एक मूक प्राणी की है जो अपना दुख बता बोल भी नहीं सकता लेकिन अगर कोई इंसान होता तब उसे भी छोड़ दिया जाता क्या ? तड़प तड़प के मरने के लिए!!



