कोरिया

संजीव बख्शी व रमेश अनुपम का कोरिया रचना साहित्य मंच ने किया सम्मान

स्नेह मिलन व काव्य गोष्ठी से साहित्यकार हुए भाव विभोर

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कोरिया की धरती साहित्यकारों की जननी रही है: संजीव बख्शी

देश-विदेश के बड़े साहित्यकारों को निरंतर पढ़ें और लाभ प्राप्त करें: रमेश अनुपम

एस. के.‘रूप’

बैकुंठपुर/ भूलन कांदा उपन्यास प्रसिद्ध कट चाय और डबल पान के लेखक भूलन कांदा उपन्यास पर बनी फिल्म भूलन दी मेज राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त संजीव बक्शी एवं प्रसिद्ध साहित्यकार समाजसेवी व आदिवासी वर्ग के लिए निश दिन कर्मशील रमेश अनुपम का विगत 22 नवंबर 2024 को कोरिया के बैकुंठपुर शहर आगमन हुआ स्थानीय सर्किट हाउस में दोनों वरिष्ठ साहित्यकारों का शहर के साहित्य एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में अग्रणी ‘कोरिया रचना साहित्य मंच’ द्वारा सम्मान किया गया इस स्नेह मिलन में शहर के वरिष्ठ व कनिष्ठ कवि लेखक गणों भाग लिया श्री बक्शी एवं श्री अनुपम ने सभी को संबोधित करते हुए साहित्य की बारीकी,समकालीन कविता,लेखन शैली, रचना धर्मिता आदि पर प्रकाश डाला। मंच द्वारा श्री बक्शी एवं श्री अनुपम का शाल श्रीफल व पुष्प गुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया कार्यक्रम में उपस्थित कवियों ने अपना काव्य पाठ किया,स्वल्पाहार के साथ कार्यक्रम पूर्ण हुआ इस अवसर पर अनीता चौहान, गीता प्रसाद नेमा,ताहिर आज़मी, शैलेंद्र श्रीवास्तव, विजय सोनी,अलीशा शेख, शारदा गुप्ता विद्रूप, अनुज मिश्रा, संवर्त कुमार ‘रूप’ सहित लेखक व कई गण मौजूद रहे।

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पद्मनाभ मिश्रा(साहित्यकार रायपुर) की कलम से :·–

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“हहौ , भूलन कांदा लेज न वो”

कल हमारे छोटे से शहर बैकुण्ठपुर (मेरे लिए प्यार से मेरा गाँव) में संजीव बख्शी जी का आगमन हुआ। साथ में रमेश अनुपम जी भी थे, जो आदिवासी समाज के साथ अपने सरोकारों हेतु क्षेत्र की यात्रा पर थे। संजीव जी की फ़ेसबुक वॉल से खबर मिली और तत्काल साहित्यिक मित्रों को खबर की गयी। एक छोटा सा स्नेह मिलन हो गया। यद्यपि मैं वहाँ उपस्थित नहीं था, पर मन में संतुष्टि थी कि हम अपनी मिट्टी में संजीव जी के साथ सार्थक साहित्य का भी सम्मान कर पाए। जिले की साहित्यिक संस्था ‘कोरिया रचना साहित्य मंच’ ने तत्परता दिखाते हुए संजीव जी की अनुमति ली और सायंकाल सर्किट हाउस में एक स्नेह मिलन का कार्यक्रम आयोजित किया। कविताएँ पढ़ गयीं। चर्चाएँ हुईं और नगर के साहित्य सेवक अभिभूत हुए। चार्ज़ हो गए।
रात को फोन पर संजीव जी ने कहा ” अच्छा रहा”। मेरा कहना था – “हम आपसे केवल ले सकते हैं, दे नहीं सकते।”

हमारे शहर में बड़े कवियों/लेखकों का का आना-जाना कम ही होता है। साहित्यकारों का आना और साहित्यकारों का उनसे मिलना कुछ ऐसा ही रहा है जैसे कि “बउरे गाँव ऊँट आवा, कोई देखा, कोऊ देखबौ न भ”। यह शहर न तो किसी महत्वपूर्ण रेल मार्ग पर है और न ही किसी सड़क मार्ग पर। “भूलन कांदा” कचरे टाइप का शहर। अपने ही इर्द-गिर्द घूमता। इस लिए बड़े साहित्यकारों का यदा-कदा यहाँ से गुज़रना इतिहास बन जाता है, जो जब कभी आते हैं, हमारी चेतना को हलोर के कहते हैं – ‘जागो’। भूले मत रहो।’

यहाँ जो आए, तीन नाम – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, मेरी याद में श्रीकृष्ण सरल, ललित सुरजन, और अब संजीव जी। एक- दो नाम और संजय अलंग भैया को याद हों शायद।

अब मुद्दे की बात कि बड़े साहित्यकारों के ऐसे सुदूर, उपेक्षित क्षेत्रों में कभी-कभी यायावरी अथवा नियोजित भ्रमण से निश्चित ही कस्बाई तथा ग्रामीण प्रगतिशील लेखन को नयी ऊर्जा मिलती है। आप लोग कभी-कभी ऐसे पिछड़े क्षेत्रों में भ्रमण कर लिया करें। हमारे अपने शहर के लेखक-कवि संजय अलंग जी अक्सर अपनी बाल्यभूमि बैकुण्ठपुर आते रहते हैं। उनके आने से भी क़लमकार प्रेरित होते हैं, सजग हो जाते हैं।

रात दिल्ली में काम से अपने फ्लैट पर लौट कर, जैसा कि संजीव जी से फ़ोन पर वादा किया था, भूलन-कांदा देखी। भूलन कांदा संजीव जी का उपन्यास है।फ़िल्म देख कर भीगी आँखों से रात साढ़े ग्यारह बजे ताहिर जी को फ़ोन किया और कहा – ‘भुलन कांता देखिहा हो, झिन भुलइहा। ‘ छूटते ही ताहिर भाई का प्रश्न आया – “ना हो, भूलन-कांदा जइसन कोनो चीज होथे का”। “मैं कहेन – वइसे त मेटाफ़र है, बकी, भूलने-भूलन कांदा फइले है सब कती”

आज के गति से तीव्र भागते समय में यह फ़िल्म धीरे-धीरे ही सही, इतिहास में अपना एक स्थान अवश्य बनाएगी। मुझे याद है, एक बार बाॅलीवुड से कोई रायपुर आया , तो कह गया कि छत्तीसगढ़ी सिनेमा में ऐसा कुछ नहीं, जो बाॅलीवुड को कुछ दे सके। उसे बाॅलीवुड से सीखना है।

अब भकला हँस कर कह सकता है – “हहौऽऽ , भूलन कांदा लेज न वो”।

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