छत्तीसगढ़

जगदलपुर_बस्तर_सूत्र_सम्मान में कोरिया के माटीपुत्र पद्मनाभ के बहुचर्चित ग़ज़ल संग्रह का औपचारिक विमोचन

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जगदलपुर/ 28 वां ठाकुर पूरन सिंह स्मृति सूत्र सम्मान – 2025 का दो दिवसीय आयोजन 25 अक्टूबर को जगदलपुर में समकालीन सूत्र और कोंडागांव ककसाड़ के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। इस प्रतिष्ठित साहित्यिक आयोजन में देश-प्रदेश से अनेक कथाकारों, रचनाकारों और आलोचकों ने सहभागिता की। दो सत्रों में विभाजित इस कार्यक्रम में वर्ष 2025 के लिए सूत्र सम्मान प्रदान किया गया तथा कई प्रतिष्ठित रचनाकारों की पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।

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प्रथम सत्र में मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथियों — आलोचक जयप्रकाश, कथाकार भालचंद्र चंद जोशी, चिंतक-संपादक सुभाष मिश्र, लेखिका-अनुवादक अमृता बेरा, साहित्यकार-इतिहासकार डॉ. संजय अलंग और कवि-संपादक सुधीर सक्सेना — के वक्तव्यों के साथ डॉ. सुनील कुमार शर्मा को राष्ट्रीय सूत्र सम्मान से सम्मानित किया गया।

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द्वितीय सत्र में कोंडागांव के कवि-कृषक डॉ. राजाराम त्रिपाठी की अध्यक्षता में डॉ. संजय अलंग और डॉ. सुधीर सक्सेना के कर-कमलों से पाँच साहित्यकारों की पुस्तकों का विमोचन हुआ तथा कवियों के रचना-पाठ का सत्र भी आयोजित किया गया। इसी सत्र में उत्तर छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के माटीपुत्र, सुपरिचित ग़ज़लकार पद्मनाभ गौतम के ग़ज़ल संग्रह “मिट्टी में जड़ जितना हूँ” का भी औपचारिक विमोचन संपन्न हुआ। मंच पर उपस्थित विशिष्ट अतिथियों के साथ-साथ पद्मनाभ की धर्मपत्नी श्रीमती श्वेता मिश्रा भी विमोचन में सहभागी रहीं।

इस संग्रह का प्रकाशन प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह “न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली” द्वारा किया गया है। विमोचन के उपरांत यह संग्रह ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अमेज़न पर विक्रय हेतु उपलब्ध हुआ और दो माह तक ‘शीर्षस्थ पचास नवीन कविता पुस्तकों’ में सम्मिलित रहा, जहाँ यह अधिकतम 13 वें स्थान तक पहुँचा।

विमोचन के पश्चात पद्मनाभ ने अपनी प्रतिनिधि समकालीन ग़ज़लों का पाठ किया। उन्होंने इस दौरान ग़ज़लों की प्रासंगिकता व समकालीनता पर भी जोर डाला। उनकी विशिष्ट अदायगी ने कार्यक्रम में समां बाँध दिया। प्रत्येक शेर पर श्रोताओं की तालियों और ‘वाह-वाह’ की गूंज से सभागार गूंज उठा। जहाँ उन्होंने ने लाक्षणिकता व गूढ़ अर्थों से भरे शेर पढ़े वहीं भाव पूर्ण पंक्तियों से भी श्रोताओं की तालियां बटोरीं। उनका एक लाक्षणिकता पूर्ण समकालीन शेर कुछ यूँ रहा –

“देखती है राख जब भी, खोजती चिंगारियां
आग से ज्यादा है पागल आग की खातिर हवा”

वहीं स्त्रीं मन को टटोलते एक भावपूर्ण शेर की बानगी कुछ ऐसी रही –

“अकेली बैठती है, हौले-हौले गुनगुनाती है
वो अपने मन की लड़की को ज़माने से छुपाती है”

इस शेर को उन्होंने कार्यक्रम का सञ्चालन कर रही उत्तर अंचल की सुपरिचित कवयित्री अनामिका चक्रवर्ती को समर्पित किया, जिनकी एक प्रसिद्ध कविता को पद्मनाभ इस शेर का प्रेरणा स्रोत मानते हैं। ज्ञातव्य है कि पद्मनाभ गौतम विगत तीन दशकों से लोक-संवेदना से जुड़ा साहित्य रचते आ रहे हैं। अंचल में वे अपनी विशिष्ट शैली में लिखे संस्मरणों, कविताओं और ग़ज़लों के लिए विशेष रूप से पहचाने जाते हैं। उनकी समकालीन रचनाएं हंस, कथाक्रम, कृति ओर, प्रगतिशील वसुधा, दुनिया इन दिनों, अक्षर पर्व आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक वेब पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। उनका पूर्व प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह “कुछ विषम सा” वर्ष 2004 में प्रकाशित हुआ था। उनकी रचनाएं आकाशवाणी के माध्यम से भी प्रसारित होती रही हैं, साथ ही उन्होंने जिला साक्षरता समिति के लिए पाठ्यपुस्तकों का लेखन भी किया है।

वर्तमान में पद्मनाभ का एक नवीन कविता संग्रह भी ५ अक्टूबर को “न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली” द्वारा प्रकाशित हुआ है, जिसका लोकार्पण आगामी विश्व पुस्तक मेले (दिसंबर 2026) में प्रस्तावित है।

इस दो दिवसीय आयोजन के सूत्रधार विजय सिंह एवं उनकी पत्नी, कवयित्री सरिता सिंह ने संपूर्ण कार्यक्रम की रूपरेखा और संचालन का उत्तरदायित्व सफलतापूर्वक निभाया। यह सम्मान प्रतिवर्ष छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों में आयोजित किया जाता है। आयोजन के पहले दिन साहित्यिक कार्यक्रम और दूसरे दिन बस्तर भ्रमण का आयोजन किया गया।

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