कोरियाछत्तीसगढ़

सोनहत में भ्रष्टाचार की ‘एकलव्य’ गाथा: केंद्र की ओट में नियम-कायदों का कत्लेआम, क्या बच्चों की सुविधाओ पर भारी पड़ेगा ठेकेदार का अहंकार?

अंधेरगर्दी का आलम: केंद्र की आड़ में 'कागज' गायब, धरातल पर नियमों का 'पोस्टमार्टम'

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इंजीनियरों व मैनेजरों की दबंगई: “राज्य का दखल बर्दाश्त नहीं”, क्या केंद्र के नाम पर मिली है भ्रष्टाचार की खुली छूट?

प्रकृति का चीरहरण: मशीन लगाकर काटे और गिराए गए ‘साल’ के वृक्ष, बेशकीमती लकड़ियों की ‘रहस्यमयी’ गुमशुदगी

श्रम कानूनों की धज्जियां: आधे मजदूरों को आधा दाम; पसीना बहाती महिलाओं के हक पर ठेकेदार का ‘डाका’

रॉयल्टी की चोरी, सीने पर वार: नदी-नालों का सीना चीरकर निकाली जा रही रेत, शासन के राजस्व को भारी भरकम चूना

​सोनहत/ आदिवासी अंचल के बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए परिकल्पित ‘एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय’ का निर्माण इन दिनों किसी लोक-कल्याणकारी योजना के बजाय भ्रष्टाचार के एक ऐसे मकड़जाल में फंसा है, जहाँ शासन की मंशा और निर्माण की हकीकत के बीच कोसो का फासला है। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस निर्माण कार्य का संचालन सीधे केंद्र की किसी एजेंसी द्वारा किया जा रहा है, जिसकी धमक और ‘पहुंच’ के सामने स्थानीय प्रशासन पूरी तरह बेबस नजर आ रहा है। आलम यह है कि राज्य के अधिकारी इस बड़े प्रोजेक्ट की कार्यप्रणाली से न केवल अनजान हैं, बल्कि वे यहाँ झांकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं।

​केंद्र की एजेंसी, बेलगाम ठेकेदार और ‘ठेंगा’ दिखाते नियम
​स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि निर्माण कार्य में लगे ठेकेदार और उनके प्रतिनिधि प्रशासनिक मर्यादाओं को तार-तार कर रहे हैं। जब भी काम की गुणवत्ता या नियमों के उल्लंघन पर सवाल उठाए जाते हैं, तो मौके पर मौजूद इंजीनियरों का एक ही रटा-रटाया जवाब होता है— “यह केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट है, इसमें राज्य के किसी भी अधिकारी का कोई हस्तक्षेप नहीं चलेगा।”

​यह अहंकार भरा बयान कई सवाल खड़े करता है:

​किस विभाग ने इस प्रोजेक्ट का टेंडर जारी किया और कौन सी एजेंसी इसे निष्पादित कर रही है?
​क्या ‘केंद्र का प्रोजेक्ट’ होने का अर्थ ‘भ्रष्टाचार का लाइसेंस’ मिल जाना है?
​क्या केंद्र की एजेंसी होने के नाते ठेकेदार राज्य के खनिज, वन और श्रम कानूनों से ऊपर हो गया है?

WhatsApp-Image-2026-03-09-at-8.07.23-PM-1024x1024 सोनहत में भ्रष्टाचार की 'एकलव्य' गाथा: केंद्र की ओट में नियम-कायदों का कत्लेआम, क्या बच्चों की सुविधाओ पर भारी पड़ेगा ठेकेदार का अहंकार?

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निर्माण शुरू होते ही गुणवत्ता दरकिनार
लोगो का कहना है कि शिक्षा के इस मंदिर की नींव में गुणवत्ता की जगह भ्रष्टाचार का ‘घटिया मसाला’ भरा जा रहा है, जिससे भविष्य में भवन कितने समय तक सही शाट टिका रहेगा यह बड़ा सवाल है।

मिट्टी मिली रेत और घटिया निर्माण
निर्माण स्थल से मिल रही शिकायतों के अनुसार, ठेकेदार द्वारा मानकों को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया है। सीमेंट के घोल में शुद्ध रेत के बजाय मिट्टी युक्त रेत का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों और जानकारों का कहना है कि मसाले में सीमेंट की मात्रा भी निर्धारित मापदंडों से काफी कम है।
करोड़ों की लागत से बन रहे इस भवन में जिस तरह की सामग्री इस्तेमाल हो रही है, वह साफ बताती है मानकों का ख्याल दूर दूर तक नही रखा जा रहा है

पर्यावरण को भारी क्षति: पेड़ धराशायी, लकड़ियां ‘लापता

निर्माण की आड़ में प्रकृति के साथ भी क्रूर मजाक किया गया है। विद्यालय निर्माण स्थल एवं उसके किनारों में मौजूद कई विशालकाय हरे-भरे साल व अन्य पेड़ों को बेरहमी से मशीनें लगा कर काट दिया गया है। गंभीर विषय यह है कि काटे गए इन पेड़ों की कीमती लकड़ियां भी मौके से गायब हैं। आखिर ये लकड़ियां बिना वन विभाग या प्रशासन की अनुमति के कहाँ गईं? यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

WhatsApp-Image-2026-03-09-at-8.07.24-PM-1024x1024 सोनहत में भ्रष्टाचार की 'एकलव्य' गाथा: केंद्र की ओट में नियम-कायदों का कत्लेआम, क्या बच्चों की सुविधाओ पर भारी पड़ेगा ठेकेदार का अहंकार?
सुरक्षा का खतरा: घटिया निर्माण से भविष्य में छात्रों की जान जोखिम में पड़ सकती है।
इस पूरे मामले में संबंधित विभाग के इंजीनियर और उच्च अधिकारियों की चुप्पी उनकी कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा करती है। क्या प्रशासन इस गंभीर लापरवाही की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर एक और सरकारी प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा?

वन संपदा पर डाका: विकास की आड़ में ‘हरियाली’ की बलि, सवालों के घेरे में जिम्मेदार विभाग
​एकलव्य विद्यालय के निर्माण कार्य ने जहाँ गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े किए हैं, वहीं परिसर में मौजूद विशालकाय पेड़ों की अवैध कटाई ने वन विभाग और निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली को संदिग्ध बना दिया है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, निर्माण की शुरुआत में ही कई दशकों पुराने पेड़ों को जड़ से उखाड़ फेंका गया, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इनकी अनुमति किसने दी?

​जवाबदेही से बचते जिम्मेदार: ये 3 बड़े सवाल
​अनुमति का रहस्य: क्या निर्माण कार्य शुरू करने से पहले वन विभाग या राजस्व विभाग से विधिवत वृक्षारोपण एवं कटाई अधिनियम के तहत अनुमति ली गई थी? यदि हाँ, तो वह अनुमति पत्र सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

और यदि नहीं, तो बिना अनुमति के इन पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने का दुस्साहस किसने किया?

​सरकारी लकड़ी कहाँ गई? नियमों के मुताबिक, यदि सरकारी भूमि पर पेड़ काटे जाते हैं, तो उनकी लकड़ियों को वन विभाग के डिपो में जमा कराया जाना अनिवार्य है। लेकिन यहाँ स्थिति उलट है—मौके से कीमती लकड़ियां पूरी तरह गायब हैं। क्या इन लकड़ियों को गुपचुप तरीके से ठिकाने लगा दिया गया है?

​किसकी शह पर हुआ खेल? पेड़ों की कटाई और लकड़ियों की हेराफेरी किसके संरक्षण में हुई? क्या ठेकेदार और संबंधित इंजीनियर ने अपनी जेब भरने के लिए प्रकृति के साथ यह खिलवाड़ किया है?

मजदूरी में भेदभाव: एक ही काम, पर महिलाओं को कम दाम
एकलव्य विद्यालय के इस ‘भारी-भरकम’ बजट वाले निर्माण कार्य में न केवल सामग्री और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ हो रहा है, बल्कि यहाँ पसीना बहाने वाले मजदूरों के साथ भी सरासर अन्याय किया जा रहा है। निर्माण स्थल पर कार्यरत महिला और पुरुष मजदूरों के बीच भुगतान में भारी अंतर का मामला सामने आया है, जिससे श्रमिक वर्ग में गहरा असंतोष व्याप्त है।
​समान कार्य, असमान वेतन
निर्माण स्थल पर मौजूद सूत्रों के अनुसार, पुरुष मजदूरों की तुलना में महिला मजदूरों को प्रतिदिन की मजदूरी काफी कम दी जा रही है, जबकि दोनों ही वर्ग सुबह से शाम तक कड़ी धूप में बराबर का श्रम करते हैं। ईंट ढोने से लेकर मसाला बनाने तक के काम में महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, फिर भी उनके मानदेय में कटौती करना श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन है।

खनिज संपदा पर डाका: स्थानीय नदी-नालों से अवैध रेत उत्खनन, रॉयल्टी और अनुमति का कहीं अता-पता नहीं

​एकलव्य विद्यालय के निर्माण में जहाँ गुणवत्ता को ताक पर रखा गया है, वहीं शासन के राजस्व को चूना लगाने का खेल भी धड़ल्ले से जारी है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, निर्माण स्थल पर उपयोग की जा रही रेत का बड़ा हिस्सा स्थानीय नदी-नालों से अवैध रूप से उत्खनन कर लाया जा रहा है।
​इस पूरे खेल में न तो पर्यावरण नियमों का पालन हो रहा है और न ही शासन को देय रॉयल्टी जमा की जा रही है।
​भंडारण की भी नहीं ली गई अनुमति
​नियमों के मुताबिक, किसी भी बड़े निर्माण कार्य के लिए रेत का भंडारण करने से पहले खनिज विभाग से विधिवत अनुमति लेना अनिवार्य है। लेकिन घुघरा में स्थिति इसके उलट है। बिना किसी वैध दस्तावेज या अनुमति के भारी मात्रा में रेत का भंडारण किया गया है। यह सीधे तौर पर खनिज अधिनियम का उल्लंघन है।

​सवालों के घेरे में खनिज विभाग
​सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या खनिज विभाग के अधिकारियों को इस अवैध उत्खनन और भंडारण की जानकारी नहीं है? या फिर ‘ऊपर तक’ पहुंच रखने वाले रसूखदारों के दबाव में अधिकारी मौन साधे हुए हैं?

​”बिना रॉयल्टी पर्ची के रेत का परिवहन और बिना अनुमति के भंडारण करना एक संज्ञेय अपराध है। क्या विभाग इस पर संज्ञान लेकर मौके पर जांच करेगा और दोषियों पर जुर्माना लगाएगा?”
​स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि ट्रैक्टरों के जरिए दिन-रात नदी-नालों का सीना चीरा जा रहा है, जिससे जलस्तर गिरने और पर्यावरण असंतुलन का खतरा बढ़ गया है। अब देखना यह है कि क्या खनिज विभाग अपनी कुंभकर्णी नींद से जागकर इस अवैध कारोबार पर नकेल कसता है या फिर यह लूट यूँ ही जारी रहे

प्रशासन को सीधी चुनौती: “केंद्र का काम है, राज्य के अधिकारी कुछ नहीं कर सकते”—इंजीनियरों का अहंकार या नियम विरुद्ध संरक्षण?

एकलव्य विद्यालय निर्माण में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर जब मीडिया और स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए, तो निर्माण एजेंसी के इंजीनियरों ने एक ऐसा बयान दिया है जो लोकतंत्र और प्रशासनिक मर्यादाओं को शर्मसार करने वाला है। सूत्रों के अनुसार, कार्य में लगे ठेकेदार के इंजीनियरों का दोटूक कहना है कि— “यह केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट है, इसमें राज्य सरकार का कोई भी अधिकारी हस्तक्षेप या कार्रवाई नहीं कर सकता।” अब सवाल उठता है कि ​क्या केंद्र का काम ‘भ्रष्टाचार’ का लाइसेंस है?
​इंजीनियरों का यह तर्क न केवल हास्यास्पद है, बल्कि यह उनकी दबंगई को भी दर्शाता है। सवाल यह उठता है कि क्या केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट होने का मतलब यह है कि ​स्थानीय खनिज संपदा (रेत) की चोरी की जा सकती है?
​बिना अनुमति के बेशकीमती पेड़ों को काटा जा सकता है?
​मजदूरी में महिला-पुरुष का भेदभाव कर श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा सकती हैं?
​और सबसे महत्वपूर्ण—क्या घटिया निर्माण कर बच्चों की जान जोखिम में डाली जा सकती है?

​संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन
​जानकारों का कहना है कि चाहे काम केंद्र सरकार का हो या राज्य का, ‘भूमि और कानून व्यवस्था’ राज्य का विषय है। अवैध उत्खनन, पर्यावरण क्षति और श्रम शोषण जैसे मामलों में स्थानीय खनिज विभाग और प्रशासन को पूर्ण अधिकार है कि वे स्थल का निरीक्षण करें और गड़बड़ी पाए जाने पर काम रुकवाकर कानूनी कार्रवाई करें।
​”इंजीनियरों का यह बयान साफ संकेत देता है कि उन्हें ऊपर से ‘अभयदान’ प्राप्त है, जिसके चलते वे स्थानीय प्रशासन को ठेंगा दिखा रहे हैं।

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