कोरिया

चुनावी डिबेट में हाथापाई, धक्कामुक्की चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन, ऐसे में प्रशासन को होना होगा सजग,कहीं ना हो घटित कोई अप्रिय घटना

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एस. के ‘रूप’

चिरमिरी एमसीबी/ भारत देश में जनता का, जनता द्वारा,जनता के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था है।

यहां जनता अपनी प्रतिनिधि चुनती है और 5 वर्ष तक वह चुना हुआ प्रतिनिधि अपने कार्य से यह दिखाता है कि उसका चुनाव योग्य रहा या अयोग्य?जनता व जनप्रतिनिधि के बीच का संवाद तो कम होता है इसे ऐसे समझिए सर्वप्रथम चुनाव में खड़े उम्मीदवार का जनसंपर्क अभियान शुरू हो जाता है।वह भी चुनावी समय हाथ जोड़ना और पैर छूना और गरीब से गरीब को देवतुल्य उपाधि दे देना आम बात है फिर बड़े-बड़े लुभावने वायदे घोषणा लेकिन अक्सर देखा गया है कि बहुमत से जीत जाने के बाद भी वायदे व घोषणाएं अधूरे रह जाते हैं और जनता खुद को ठगी महसूस करने लगती है। अब जीते हुए का दायरा भी बड़ा हो जाता है इसलिए कुर्सी संभालने के बाद वही जो पहले घर-घर जाकर चरणों तक में निवेदित हुआ करते थे वह फोन या अन्य माध्यम में से भी उपलब्धिकारी नहीं रहते सरलीकरण की जगह प्रक्रिया और जटिल हो जाया करती है।

इधर जिसे लोकतंत्र में जनता जनार्दन कह दिया जाता है वह भी कुछ हद तक लालच के दलदल में फंस कर सही चुनाव नहीं कर पाती है चुनावी कालमें सभी को ज्ञात है कि शराब व धन सहित अन्य कई साधनों से कई मतदाता अपने वोट को नोट से बेच देता है क्रय विक्रय का खेल क्या यही लोकतंत्र है ? क्या चुनावी प्रक्रिया का उचित निर्वहन है? बाद में दोष देना चुने हुए प्रतिनिधि को कहां तक उचित है?क्योंकि प्रथम दृष्ट्या आपने ही तो अपना अमूल्यमत चंद रुपयों के लालच में बेच ही दिया और खरीददार ने अपना खर्चा किया है वह तो आपसे ही वसूलेगा न। राजा हरिश्चंद्र की तरह सत्य के मार्ग पर चलने वाले केवल एक ही हुए ।भगवान श्री राम प्रभु जैसा रामराज इस कलयुग में संभव नहीं है लेकिन वह प्रत्याशी जो आपके लिए सच में कार्य करता है, वह जो केवल चुनावी समय ही नहीं हर समय आपके लिए खड़े रहता है, वह जिसे सच में विकास की गाथा में अध्याय जोड़ हो, वह जिसने अपना वायदा निभाया हो, वह जिसे आप उसकेआचरण विचार व उसके कार्यों से निर्णय से यह भाप ले कि उक्त व्यक्ति आपके क्षेत्र समाज राज्य व राष्ट्र के हितबद्ध कार्य करेगा न्याय करेगा उसे ही अपना अमूल्य मत दे। धन आदि के लालच ग्रामीण अंचल व वनांचलों में अधिक देखने को मिलते हैं लेकिन शहर में भी यह अछूता नहीं है इसके लिए बकायदा फंड जारी होते आए है ठीक उसी तरह हांथी के दांत दिखाने और खाने के कुछ और । यह नहीं होना चाहिए आदर्श आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। साथ ही जो योग्य है उसके साथ अन्याय है। राज्य निर्वाचन आयोग व पुलिस प्रशासन को आदर्श आचार संहिता का कड़ाई से पालन करवाना अनिवार्य है।

चुनावी डिबेट में धक्का मुक्की हाथापाई :·

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जनप्रतिनिधि से प्रश्न करने का अधिकार जनता को होना चाहिए देश के लोकसभा व राज्यसभा की बात अलग है वहां चुने हुए प्रतिनिधि सदस्यता प्राप्त करके आपस में वाद विवाद तर्क आरोप प्रत्यारोप करते हैं जहां कभी-कभी उग्र विवाद भी हो जाता है और सदन की कार्यवाही स्थगित व वॉक आउट कर दिया जाता है लेकिन जब चुनावी डिबेट किसी शहर में,किसी चौक चौराहे में,किसी ग्राम में इसमें ध्यान देना होगा की जनता अपने प्रश्न करें और सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधि जवाब दे साथ ही विनम्रता पूर्वक विपक्ष अपना तर्क प्रस्तुत करें लेकिन केवल दलों के कुछ नेताओं को खड़ा करके उनसे ही प्रश्न किया जाए और जनता के केवल दर्शक के रूप में हुल्लड़ करें तो प्रक्रिया वैसे ही अनुशासनहीनता वाली हो जाती है। ऐसे में आत्मसंयमी व्यक्ति, धैर्यवान ही टिक सकता है और इस क्षेत्र में इन गुणों की कमी ही दिखाई देती है नेता तो भड़क ही जाते है उनके साथ, उनके समर्थक ज्यादा भड़क जाया करते हैं हो भी क्यों ना चलना तो उन्हीं से है इसलिए जरूरी है प्रशासन को इस और ध्यान देना ताकि भविष्य में कभी ऐसी स्थिति निर्मित ना हो ।कुछ तो परमिशन भी नहीं लेते केवल प्रभाव में कार्य संपन्न कर दिया जाता है लेकिन परमिशन के साथ पुलिस के स्टाफ की नियुक्ति ऐसे चुनावी डिबेट में हो तो चिरमिरी में 4 फरवरी को नेताओं के आपस में धक्का मुक्ति हाथापाई जिसे निंदनीय घटना भविष्य में ना हो इसे नियंत्रित किया जा सकेगा ऐसा संदेश राजनीतिक गलियारों के लिए भी सही नहीं है यह चिंतनीय विषय है।

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