कोरिया

जनजातियों के सामाजिक आर्थिक विकास विषय पर संगोष्ठी आयोजित

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बैकुण्ठपुर / दिनांक 20.11.2024 – जनजातीय गौरव माह अंतर्गत कलेक्टर कोरिया से जारी कैलेण्डर के अनुसार शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय बैकुण्ठपुर के सभाकक्ष में जिला स्तरीय एक दिवसीय संगोष्ठी जनजातियों के सामाजिक आर्थिक विकास विषय पर आयोजित हुआ।

h-300x225 जनजातियों के सामाजिक आर्थिक विकास विषय पर संगोष्ठी आयोजित

जिसमें कोरिया जिले के विभिन्न महाविद्यालयों के प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता किया। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में श्री सूर्य प्रताप सिंह नेताम जिलाध्यक्ष सर्व आदिवासी समाज कोरिया, विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री विजय सिंह ठाकुर सचिव, सर्व आदिवासी समाज कोरिया शामिल हुए। कार्यक्रम के अध्यक्षता प्राचार्य डॉ. ए.सी.गुप्ता ने किया। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. आर.एन.कच्छप प्राचार्य शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय बैकुण्ठपुर का व्याख्यान हुआ। संगोष्ठी का शुभारंभ अतिथियों द्वारा भगवान बिरसा मुण्डा, रानी दुर्गावती और शहीद वीर नारायण सिंह के छायाचित्र पर मार्ल्यापण और दीप प्रज्वलित कर किया गया। अतिथि स्वागत उपरांत संगोष्ठी के संयोजक डॉ. जे.आर.कवंर विभागाध्यक्ष समाजशास्त्र ने स्वागत उद्बोधन दिया और संगोष्ठी आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जनजातीय जननायकों का देश के आजादी और जल जंगल जमीन की रक्षा तथा देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जिन्हें कोई नहीं जानता है, उन्हें जानना और उनके योगदान को समझना आवश्यक है। रासेयो स्वयं सेविका कु. पूजा पंकज ने आदिवासी लोकगीत की सुन्दर प्रस्तुति दी। मुख्य वक्ता डॉ. आर.एन.कच्छप ने कहा कि भारत में जनजातियों की संस्कृति विश्व प्रसिध्द है जो अनूठी और अनुपम है। जनजाति प्रकृति पूजक है उनकी आत्मा पेड़ों में बसती है, महात्मा गांधी ने उन्हें गिरिजन कहा था। उन्होंनें गुलामी कभी स्वीकार नहीं किया। भगवान बिरसा मुण्डा ने उलगुलान आंदोलन चलाया जिसका मुख्य उद्देश्य जल जंगल जमीन की रक्षा करना, नारी सुरक्षा और समाज की संस्कृति व मर्यादा को बनाए रखना था। सरल सीधे स्वभाव के जनजाति प्रारंभ में जंगलों में गुफाओं में निवास करते थे। देश की कुल जनसंख्या के 8.6 प्रतिशत लोग जनजाति है। सभी जनजातियों की विशेष सामाजिक संस्कृति पायी जाती है। जंगलों से कंद फल फूल एकत्र करना, वनोपज का संग्रहण, कृषि कार्य, पशुपालन, मजदूरी करना इनका मुख्य पेशा रहा है। कलांतर में औद्योगीकरण के नाम पर वनो की कटाई होने लगा, उनका पलायन शहरो की ओर होने लगा। विचौलियों उनका शोषण करने लगे। पहले वस्तु विनिमय प्रथा थी बाद में मुद्रा आया। शिक्षा का प्रसार हुआ लोग शहर आने लगे उनका जीवन स्तर बदलने लगा, आज भी कुछ जनजातियां अत्यंत पिछडे है निम्न स्तर पर जीवन यापन कर रहे हैं। उन्हें मुख्यधारा में लाने की जरूरत है। विकसीत भारत का संकल्प जनजातियों को साथ लेकर चलने से ही संभव है जिसके लिए भारत सरकार लगातार प्रयास कर रही है। प्रो. शैलेष मिश्रा जी ने कहा कि आज का विद्यार्थी अपना नायक फिल्मी दुनिया के हीरो को मानता है जबकि देश और समाज के लिए कुर्बानी देने वाले महापुरूषों को अपना हीरो कोई नहीं बताता है। महापुरूषों के बारे में पढ़ें उन्हें अपना नायक माने तो आपको देष के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिलेगी। विशिष्ट अतिथि विजय सिंह ठाकुर ने अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जनजातियों के आंदोलन को बताते हुए कहा कि जनजातियों ने अंग्रेजों का हमेशा विरोध किया, लगान नही दिया। जल जंगल जमीन की रक्षा के लिए कुर्बानी तक दिया। भाषा का विकास, आत्मनियंत्रण पाहियों का अविष्कार, कृषि कार्य, फलों सब्जियों का उत्पादन जड़ी बूटी का ज्ञान, अध्यात्मिक ज्ञान यह सब जनजाति समाज की विशेषता है। षिक्षा के विस्तार ने उनके जीवन को एक नई दिषा दिया है। मुख्य अतिथि श्री नेताम जी ने जनजातीय गौरव दिवस आयोजन के लिए सरकार की सराहना किया तथा उन्होने जनजातियों के विभिन्न प्रकार को बतलाते हुए अलग -अलग राज्यों में उनकी संख्या एवं संस्कृति पर प्रकाश डाला। भगवान बिरसा मुण्डा, रानी दुर्गावती वीरनारायण सिंह, गुण्डाधुर, गेंद सिंह ,भीमा नामक, झलकारी बाई के योगदान कों रेखांकित किया साथ ही डॉ0 बी0 आर0 अम्बेडकर जी के संवैधानिक प्रावधानो से अवगत कराया। उन्होंनें चिन्ता जाहिर करते हुए कहा कि आज हमारा समाज नशा पान की ओर बढ़ रहा है जो नुकसानदायक है। कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. ए.सी.गुप्ता ने विद्यार्थियों से कहा कि आप सब जनजातीय जननायकों के बारे में जाने उनसे प्रेरणा लें। प्रतियोगी परिक्षाओं में उनसे जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। प्रो. एम.सी.हिमधर ने जनजातियों के अनूठी संस्कृति को रेखांकित किया साथ ही बताया कि आज कई सामाजिक समस्याएं जैस लिंगभेद, दहेज प्रथा इनमें देखने को नहीं मिलता है किन्तु भूमि से अलग होना, अशिक्षा, बंधक मजदूरी, निर्धनता, त्रणाग्रस्ता से जूझ रहे हैं। शहरीकरण व व्यवसायीकरण के कारण लगातार आदिवासी संस्कृति के लोकगीत व लोक नृत्य में फूहड़ता शामिल हो रहा है जिस पर ध्यान देने की जरूतर है। कार्यक्रम का संचालन और आभार प्रदर्शन श्रीमती जयश्री प्रजापति सहायक प्राध्यापक गृहविज्ञान ने किया। कार्यक्रम में प्राध्यापक डॉ. जी.के.मिश्र, बी.के.पाण्डेय, डॉ. सुमित डे, वरूण कुशवाहा, सुश्री पूनम टोप्पो, मनोज कुमार, बी.एल.सोनवानी, डॉ. संदीप सिंह, डॉ. रामयश पाल, शुभूप्रसाद रैदास सहित छात्र/छात्रा उपस्थित रहे। कार्यक्रम के सफल आयोजित में कार्यक्रम अधिकारी डॉ. प्रीति गुप्ता व अनुरंजन कुजूर सहित रासेयो स्वयंसेवक कृष्णा राजवाड़े, शशि पोर्ते, तनुप्रिया, संगीता यादव, पूजा पंकज, नीरज, लवकुश, का सराहनीय योगदान रहा।

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