
बैकुंठपुर/ जिला मुख्यालय की सड़कें आज भी उसी संकीर्ण दायरे में सिमटी हुई हैं, जैसी दशकों पहले थीं। विकास की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की उदासीनता का आलम यह है कि मुख्य मार्ग का चौड़ीकरण आज भी सिर्फ़ कागज़ों में कैद है। स्थानीय लोगों को जाम, धूल, गड्ढों और दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है। बढ़ते ट्रैफिक, स्कूलों की बसें, मरीजों की एंबुलेंस और बाजार की भीड़ इस संकरी सड़क पर रोज़ाना संघर्ष करती है — लेकिन न तो प्रशासन गंभीर है, न ही नेताओं को कोई फिक्र।
वादे बहुत हुए, लेकिन ज़मीन पर काम नहीं
बीते वर्षों में *कई बार सर्वे, निरीक्षण और घोषणा की गई* कि जिला मुख्यालय की सड़कें चौड़ी की जाएंगी। लेकिन भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हुई और बजट की फाइलें विभागीय गलियारों में धूल फांक रही हैं। स्थानीय दुकानदार बताते हैं, “हर साल सुनते हैं कि रोड चौड़ी होगी, लेकिन हालत जस की तस है। यहां विकास केवल नेताओं के भाषणों में दिखता है।”
गड्ढों से पटे रास्ते, मौत को न्यौता
सड़क पर गड्ढे इतने हैं कि बारिश में उनका अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। रोज़ाना स्कूली बच्चों से लेकर आम नागरिकों तक को जान जोखिम में डालकर सफर करना पड़ता है। इस मार्ग से *ग्रामों को जिला मुख्यालय से जोड़ने वाली प्रमुख आवाजाही होती है*, इसलिए इसका महत्व केवल शहर के लिए नहीं बल्कि पूरे जिले के लिए है।
जनता का सब्र टूट रहा है
सामाजिक संगठनों और RTI कार्यकर्ताओं द्वारा बार-बार ध्यान आकर्षित करने के बावजूद कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो रही।* ज्ञापन, सोशल मीडिया अभियान और प्रशासन से सीधी बातचीत के बाद भी केवल आश्वासन ही मिले हैं।
चुनाव में विकास, बाद में मौन शासन
हर चुनाव से पहले सड़क चौड़ीकरण सबसे बड़ा वादा बनता है, लेकिन चुनाव बाद नज़रें फेर ली जाती हैं। इस बार जनता पूछ रही है —“आख़िर कब तक केवल वादे होंगे? और कब शुरू होगा ज़मीनी काम? क्या बैकुंठपुर की जनता को एक चौड़ी, सुरक्षित और सुविधा युक्त सड़क का सपना देखना छोड़ देना चाहिए? या अब समय आ गया है कि जनता जवाब मांगने सड़क पर उतरे? आपकी राय और अनुभव साझा करें, क्योंकि सवाल पूछना आपका हक है और जवाबदेही उनकी ज़िम्मेदारी।



