कोरिया

महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन के साक्षी थे- कृष्णा भाई

जिन्होंने राष्ट्रीय ध्वज और खादी के प्रचार में जीवन के 78 साल कर दिए समर्पित

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मनेन्द्रगढ/ आज पूरा राष्ट्र 79 स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, देशभर में तिरंगा यात्राएं निकाली जा रही है। जिस राष्ट्रीय ध्वज को देश की लोकतांत्रिक पहचान और राष्ट्रीय बोध का प्रतीक समझा जाता है उसी , खादी के तिरंगे को गांधी आश्रम, खादी भंडार के प्रथम संस्थापक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व कृष्ण प्रसाद उपाध्याय 60 वर्षों तक जन-जन तक पहुंचाते रहे।

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अपने राष्ट्रवादी पिता की तिरंगा की बिक्री एवं खादी के प्रचार प्रसार के कार्यों का स्मरण करते हुए उनके 65 वर्षीय पुत्र सतीश उपाध्याय ने बतलाया कि- पिताजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और 65 वर्षों तक ही खादी वस्त्रों एवं तिरंगे प्रचार प्रसार में अपने जीवन को समर्पित कर दिया। पुरानी स्मृतियों को कुरेदते हुए उन्होंने बताया कि-15 अगस्त 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों में राष्ट्रीय ध्वज की बिक्री बहुत बढ़ जाती थी। विभिन्न कार्यालय, विद्यालयों एवं सरकारी संस्थाओं के लोग रात 2:00 बजे तक निवास में आकर झंडा खरीद करते थे। उनका कथन था कि -मैं राष्ट्र का एक छोटा सा सिपाही हूं और मेरा यह सौभाग्य है, कि उस तिरंगे की सेवा में लगा हुआ हूं जो आजाद भारत के लाखों लोगों के बलिदानों का प्रतीक है। अपनी पूरी जिंदगी खादी वस्त्र के पहनने वाले उपाध्याय का कहना था कि खादी वस्त्र नहीं विचार है। राष्ट्रीय ध्वज को एकता अखंडता ,साहस एवं बलिदान का प्रतीक बताते हुए वे सामूहिक ध्वजारोहण कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे।

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे के संपर्क में रहे स्व कृष्ण प्रसाद उपाध्याय ने स्वतंत्रता आंदोलन का संघर्ष भोगा । वे 1942 में बनारस के सेंट्रल जेल में रहे एवं अंग्रेजों की यात्राओं को भोगा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होते हुए भी उन्होंने कभी शासकीय सुविधाओं का लाभ नहीं लिया। इसीलिए शासकीय दस्तावेजो में उनका नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की सूची में दर्ज नहीं हो पाया। वाराणसी उत्तर प्रदेश चौखंबा मोहल्ला दूध विनायक मंगला गौरी के रहने वाले स्व कृष्ण प्रसाद उपाध्याय का परिवार पिछले 65 वर्षों से आज भी निरंतर मनेंद्रगढ़ में निवास में कर रहा है।

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18 जनवरी 1943 को वे जिला जेल वाराणसी में बंदी रहे एवं मार्च 1943 में उन्हें जिला जेल से सेंट्रल जेल बनारस भेज दिया गया था, बाद में कृष्णा भाई को 28 अक्टूबर 1943 को जिला जेल से मुक्त कर दिया गया ।जेल से छूटने के बाद में पुनः राष्ट्रपिता बापू के विचारों से प्रेरित होकर देश के सुप्रसिद्ध खादी आंदोलन के नेता अनिल भाई ,राजाराम भाई, धीरेंद्र भाई कपिल भाई के साथ दरिद्र नारायण की सेवा के लिए खादी के प्रचार प्रसार के साथ तन मन धन से कूद पड़े ।उस समय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं आजादी के दीवानों के द्वारा पूरे देश में खादी के प्रति जन आंदोलन चलाया जा रहा था।किया ।कृष्ण प्रसाद उपाध्याय आगे चलकर आचार्य कृपलानी एवं विचित्र नारायण शर्मा के सानिध्य में आए कृपलानी जी उस समय काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थे एवं गांधी जी के इंकलाबी विचारों से काफी प्रभावित थे। कृष्णा भाई कहा करते थे- खादी वस्त्र नहीं विचार है ,वे गांधी आश्रम जबलपुर के मंत्री पद में भी रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी आश्रम की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का गांधी आश्रम ही आश्रय स्थल हुआ करता था ,लगभग 70 वर्षों तक खादी के प्रचार प्रसार के लिए समर्पित होकर अपना जीवन होम करने वाले कृष्ण प्रसाद उपाध्याय एक अभूतपूर्व संकल्प के साथ पूरी जिंदगी खादी को ही आत्मसात किया था एवं जन जन तक खादी के प्रचार किया था। वे 9 वर्ष की उम्र से ही वे खादी के प्रचार प्रसार में जुड़ गए थे। बाद में उन्हें ₹20 मासिक वेतन पर खादी के प्रचार प्रसार का कार्य दिया गया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने एवं राष्ट्रीय चेतना जगाने का कार्य स्वप्रेरणा से वे किया करते थे ।खादी आंदोलन के प्रणेता कृष्ण प्रसाद उपाध्याय सर्वोदय समिति सरगुजा प्रबंध समिति के भी सदस्य रहे। खादी के प्रचार के सिलसिले में उन्होंने काफी समय तक मंडला मध्य प्रदेश एवं लखनऊ उत्तर प्रदेश के गांधी आश्रम खादी भंडार में भी खादी के प्रचार प्रसार का काम किया। 1956- 57 में मनेद्रगढ़ आकर खादी को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया तथा गांधी आश्रम ,खादी भंडार की स्थापना की वे कोरिया जिले की एक मात्र खादी भंडार संस्थापक सदस्य रहे। मनेद्रगढ़ स्थित गांधी आश्रम को उन्होंने स्थापित किया एवं 6 दशकों तक गांधी जी के विचारों के संवाहक बने रहे ।वे आचार्य विनोबा भावे एवं आचार्य कृपलानी जी के साथ खादी आंदोलन में सक्रिय रूप से कार्य करते रहे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संपर्क में रहे इस खादी कार्यकर्ता के दस्तावेजों के आधार पर पता चलता है किआचार्य विनोबा भावे पीलीभीत जिले में भूदान द्वारा प्राप्त भूमि में 600 परिवारों को एवं पांच गांवों को 1956 में बसाया था। इस आंदोलन में कृष्णा भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही ।कृष्णा भाई महात्मा गांधी पंडित जवाहरलाल नेहरू आचार्य कृपलानी संत विनोबा भावे जय प्रकाश नारायण, डॉ राजेंद्र प्रसाद आदि के साथ खादी के स्वदेशी आंदोलन, राष्ट्रीय चेतना एवं सामाजिक मसलों पर निरंतर संपर्क में रहे ।कृष्णा भाई के दो पुत्र एवं पुत्रियां हैं। उनके बड़े पुत्र गिरीश पंकज रायपुर में निवास करते हैं एवं देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं, छोटा पुत्र सतीश उपाध्याय पर्यावरण एवं योग के जन आंदोलन से जुड़े हुए हैं। अपने पिता की प्रेरणा एवं विचार से प्रेरित होकर तक खादी वस्त्र को जन-जन तक पहुंचाने के योगदान के कारण उनके बड़े पुत्र गिरीश पंकज भी केवल खादी वस्त्र को ही पहनने का संकल्प ले चुके हैं ।
कृष्ण प्रसाद उपाध्याय का परिवार आज भी 6 दशकों से अधिक समय से झोपड़ी नुमा कच्चे मकान में मनेद्रगढ़ में निवास कर रहा है ।खादी आंदोलन के प्रणेता एवं महात्मा गांधी के विचारों के संवाहक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कृष्ण प्रसाद उपाध्याय 18 मार्च 2013 को रायपुर में 86 वर्ष की उम्र में चिर निद्रा में लीन हो गए। खादी के प्रचार प्रसार के लिए उनके योगदान एवं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन के लिए उनके कार्य को आज भी खादी जगत से जुड़ा हर व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक याद करता है।

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