
मेरे गुरू बाबा के जयंती में आना।
दया, प्रेम, करूणा, सत्य ही पाना ।।
मनखे मनखे एक समान, बाबा का संदेश महान्।
पर नारी को माता जानो, तब बदलेगा सारा जहान ।।
ऐसे समभाव को जग बिखराना।
मेरे गुरू बाबा के जयंती में आना।।
सर्प डसा बुधारू को. बाबा ने जिलाया।
बैगन के बाड़ी में, मिर्च फलाया।।
ऐसा करिश्मा कहां है बताना।
मेरे गुरू बाबा के जयंती में आना।।
छः मास की मृत माता सपुरा को, सत्यनाम से जीवन देता।
दुखियों के हर दुःख को हरता, बदले में संतो से श्रद्धा ही लेता।।
ऐसे सत मानव को कभी न भुलाना।
मेरे गुरू बाबा के जयंती में आना ।।
सत्य, अहिंसा और मानवता, जीवन का यह सार सिखाया।
एक दिन आना एक दिन जाना, फिर किस बात का है इतराना।।
ऐसे गुरू चरणों को शीश झुकाना। मेरे गुरू बाबा के जयंती में आना।।
पाहन पूजे सो हरि मिले है, तो मैं पूजूँ सारा पहाड़।
गुरू पूजे सो मुक्ति मिले है, सत्य है जान ले मुर्ख गवांर।।
चौका पंथी, आरती घर- घर कराना।
मेरे गुरू बाबा के जयंती में आना ।।
चल संगवारी गिरौद घुमा दूं, बाबा के महिमा का दर्शन करा दूँ।
लाखों, करोड़ों, जाते यहां है, मन चाहे मन्नत पाते वहां है।।
फिर कभी जाने का, कर ना बहाना।
मेरे गुरू बाबा के जयंती में आना ।।
मेरे गुरू बाबा के जयंती में आना।
दया, प्रेम, करूणा, सत्य ही पाना।।
(प्रो. एम. सी. हिमधर)
बैकुण्ठपुर, जिला- कोरिया (छ.ग.).



